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प्रदूषण तथ्य

वैश्विक रूप से कण प्रदूषण, मानव स्वास्थ्य के लिए दुनिया भर में सबसे बड़ा खतरा है।

AQLI ने यह निर्धारित किया है कि कण प्रदूषण से व्यक्ति का जीवन औसतम पे लगभग 2 वर्ष कम हो जाता है—विनाशकारी संचारी रोग जैसे की ट्युबरक्युलॉसिस और HIV/AIDS, जानलेवा आदतों जैसे सिगरेट पीना और यहां तक कि युद्ध से भी अधिक।

कणीय पदार्थों (पार्टिकुलेट मैटर – पीएम) से होने वाला वायु प्रदूषण मुख्यतः जीवाश्म इंधन के जलने का परिणाम होता है। इसे दुनिया भर में वायु प्रदूषण का सबसे घातक स्वरूप माना जाता है। वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स – एक्यूएलआइ) दर्शाता है कि कणीय पदार्थों का संक्रेद्रण विश्व स्वास्थ्य संघ (डब्ल्यूएचओ) द्वारा सुरक्षित समझी जाने वाली सीमा में रहने पर पूरी दुनिया की सारी महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की जितनी औसत जीवन संभाव्यता (अर्थात औसतन जितने वर्ष जीवित रहने की संभावना) होती, कणीय पदार्थों से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण वह उससे लगभग 2 वर्ष घट जाती है। जीवन संभाव्यता को होने वाला यह नुकसान टीबी और एचआइवी/ एड्स जैसे संचारी रोगों, सिगरेट पीने जैसे व्यवहार जनित मारकों और यहां तक कि युद्ध के कारण होने वाले नुकसान से भी अधिक विनाशकारी है। इसका दुनिया के कुछ क्षेत्रों पर दूसरे क्षेत्रों से अधिक प्रभाव पड़ता है। जैसे, संयुक्त राज्य अमेरिका (इसके बाद से सिर्फ अमेरिका) में, जहां प्रदूषण कम है, इससे जीवन संभाव्यता में विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन से मात्र 0.1 वर्ष कमी आती है। लेकिन चीन और भारत में, जहां प्रदूषण काफी अधिक है, कणीय पदार्थों के संकेंद्रण को घटाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के स्तर तक ले लाने पर औसत जीवन संभाव्यता क्रमशः 2.9 वर्ष और 4.3 वर्ष बढ़ जाएगी।

‘‘कणीय वायु प्रदूषण से जिंदगी दुनिया भर में घट जाती है, यहां तक कि सिगरेट से भी अधिक। इस समय मानव स्वास्थ्य पर इससे अधिक जोखिम किसी भी दूसरी चीज से नहीं है।’’ – माइकल ग्रीनस्टोन, मिल्टन फ्रीडमैन प्रोफेसर इन इकोनॉमिक्स, यूनिवर्सिटी ओफ़ शिकागो


कणीय वायु प्रदूषण स्वास्थ्य पर कैसे प्रभाव डालता है?

कणीय पदार्थ (पीएम) का अर्थ कजली, धुआं, धूल, और अन्य चीजों के वैसे ठोस या तरल कण होते हैं जो हवा में निलंबित रहते हैं। जब हवा कणीय पदार्थों से प्रदूषित होती है, तो ये कण हमारे शरीर की जरूरत वाले ऑक्सीजन के साथ हमारी श्वास प्रणाली में प्रवेश कर जाते हैं।

जब कणीय पदार्थ सांस के जरिए हमारी नाक या मुंह में जाते हैं, तो हर कण का भाग्य उसके आकार पर निर्भर करता है – जितने छोटे कण होते हैं, वे हमारे शरीर में उतने ही अधिक अंदर चले जाते हैं। 10 माइक्रोमीटर से कम व्यास वाले पीएम10 कणों को ‘‘पूर्णतः निलंबित पदार्थ’’ (टीएसपी) में शामिल किया जाता है। वे इतने छोटे होते हैं कि नाक में मौजूद बालों के बीच से घुसकर अंदर चले जाते हैं। वे श्वास मार्ग से होकर हमारे फेफड़ों में चले जाते हैं जहां कणों की सतह पर मौजूद धातु वाले तत्व फेफड़े के कोषों का ऑक्सीकरण कर देते हैं, उनके डीएनए को क्षतिग्रस्त कर देते हैं और कैंसर पैदा होने का जोखिम बढ़ा देते हैं। [1] फेफड़ा के कोषों के साथ कणों के संपर्क के कारण सूजन, जलन, विक्षोभ, और हवा का प्रवाह में रुकावट पैदा होती है जिससे सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजॉर्डर), सिस्टिक लंग डिजिज, और ब्रौंकाइटिस जैसे सांस लेने में कठिनाई को बढ़ाने वाले फेफड़े के रोगों के बढ़ने का जोखिम बढ़ जाता है। [2]

इससे छोटे कण – पीएम2.5 अर्थात 2.5 माइक्रोमीटर से कम व्यास वाले कण – तो और भी अधिक घातक होते हैं। उनका व्यास मनुष्यों के बाल का मात्र 3 प्रतिशत होता है। फेफड़े के रोग का जोखिम बढ़ाने के अलावा, पीएम2.5 और भी गहराई तक चले जाते हैं – फेफड़े की अल्वियोली में जो रक्त-नलिकाओं से ढंके एयर सैक्स होते हैं जहां खून कार्बन डायक्साइड छोड़कर ऑक्सीजन ग्रहण करता है। अल्वियोली से होकर खून की धारा में घुसते ही पीएम2.5 रक्त-नलिकाओं में सूजन पैदा करके या वसायुक्त पपड़ी बनाकर उन्हें संकरा कर देते हैं। इससे रक्तचाप बढ़ जाता है या खून के थक्के बनने लगते हैं। इसके कारण हृदय और मस्तिष्क तक पहुंचने वाला रक्त का प्रवाह रुक सकता है जिसके चलते स्ट्रोक या हृदयाघात (हर्ट अटैक) हो सकता है। हाल के वर्षों में शोधकर्ताओं ने गौर करना शुरू किया है कि कणीय पदार्थ जनित प्रदूषण संज्ञानात्मक कार्यों (कॉग्नीटिव फंक्शंस) को घटाने से भी जुड़ा हुआ है। उनलोगों का सोचना है कि खून के प्रवाह में पीएम2.5 के पहुंचने के चलते सूजन होने से मस्तिष्क अधिक तेजी से बूढ़ा होने लग सकता है। इसके अलावा इससे मस्तिष्क का श्वेत पदार्थ भी क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसी श्वेत पदार्थ के कारण मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों के द्वारा संवाद हो पाता है। [3] श्वेत पदार्थ के क्षतिग्रस्त होना, जो पीएम2.5 के कारण रक्त का प्रवाह घटने के चलते भी हो सकता है, अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसे रोगों से भी जुड़ा हुआ है। [4]

पीएम2.5 कणों का छोटा आकार उन्हें शारीरिक लिहाज से ही नुकसानदेह नहीं बनाता। इसके कारण ये कण हवा में संभवतः हफ्तों तक मौजूद रह सकते हैं और सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर यात्रा कर सकते हैं। [5] इससे इसकी आशंका बढ़ जाती है कि ये कण जमीन पर पहुंचकर इकट्ठा होने के पहले मनुष्यों की सांस के जरिए उनके शरीर में पहुंच जाएंगे।

वायु गुणवत्ता जनित जीवन सूचकांक कणीय प्रदूषण के संकेंद्रण की स्थिति में लंबे समय होने वाले एक्सपोजर को जीवन संभाव्यता पर उनके प्रभाव में बदल देता है। इस सूचकांक का मुख्य निष्कर्ष यह है कि 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर अतिरिक्त पीएम2.5 का लंबे समय तक एक्सपोजर होने पर जीवन संभाव्यता 0.98 वर्ष घट जाती है। इसका अर्थ हुआ कि उसका संकेंद्रण स्थायी रूप से घटकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के अनुरूप आ जाने पर संघाई के निवासी औसतन 4.1 वर्ष अधिक जीने की आशा कर सकते हैं। अमेरिका में, जहां आम तौर पर कणीय प्रदूषण की गंभीरता अनेक अन्य देशों की तुलना में कम है, उसका संकेंद्रण स्थायी रूप से घटकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के अनुरूप आ जाने पर लॉस एंजेल्स के निवासी औसतन नौ महीने अधिक जीने की आशा कर सकते हैं।

कणीय वायु प्रदूषण स्वास्थ्य संबंधी अन्य जोखिमों के साथ कैसे तुलनीय है??

हमें मालूम है कि लोगों के लिए 80 वर्ष, 90 वर्ष, यहां तक कि उससे भी अधिक जीना संभव है। लेकिन 2016 में जन्मे औसत शिशु से 72 वर्षों तक जीने की आशा की जाती है। जीवन संभाव्यता में कई कारणों से कमी आती है जिसमें धूम्रपान, टीबी, और एचआइवी/ एड्स जैसी बीमारियां कुछ सबसे अधिक घातक दोषियों में शामिल हैं। वायु गुणवत्ता जनित जीवन सूचकांक दर्शाता है कि कणीय वायु प्रदूषण जीवन संभाव्यता को इन सारे कारणों की अपेक्षा अधिक घटा देता है।

वायु गुणवत्ता जनित जीवन सूचकांक के अनुसार, अगर कणीय प्रदूषण का वर्तमान स्तर बरकरार रहे, तो आज की दुनिया में मौजूद लोगों की कुल मिलाकर 12.8 अरब वर्ष जिंदगी सीधे-सीधे इस कणीय प्रदूषण के कारण कम हो जाएगी। इसका अर्थ हुआ कि हर व्यक्ति की औसतन 1.8 वर्ष जिंदगी घट जाएगी। लेकिन पूरी दुनिया में कणीय प्रदूषण घटकर 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के स्तर पर आ जाय और बाकी सारी चीजें आज जैसी ही रहें, तो दुनिया भर में जन्म के समय औसत जीवन संभाव्यता 1.8 वर्ष बढ़कर लगभग 74 वर्ष हो जाएगी।

इस परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने पर सिगरेट पीने वालों द्वारा धूम्रपान के कारण दुनिया भर की औसत जीवन संभाव्यता में  लगभग 1.6 वर्ष की, अल्कोहल और नशीली दवाओं के उपयोग के कारण 11 महीने की, असुरक्षित पानी और स्वच्छता के कारण 7 महीने की, और एचआइवी/ एड्स के कारण 4 महीने की कमी आती है जबकि विवाद और आतंकवाद के कारण 22 दिनों की कमी आती है। इसलिए कणीय प्रदूषण का जीवन संभाव्यता पर होने वाला प्रभाव धूम्रपान के प्रभाव के बराबर, अल्कोहल और नशीली दवाओं के प्रभाव का दूना, असुरक्षित जल के प्रभाव का तिगुना, एचआइवी/ एड्स के प्रभाव का पांचगुना और विवाद तथा आंतकवाद के प्रभाव का 29-गुना होता है। [6]

समग्रता में कणीय प्रदूषण का इतना अधिक भयंकर प्रभाव किस कारण से होता है? मुख्य अंतर यह है कि प्रदूषित क्षेत्र के निवासियों के पास कणीय प्रदूषण से बचने के लिहाज से करने के लिए बहुत कम उपाय होते हैं क्योंकि हर किसी को सांस तो हवा में ही लेनी होती है। इसके विपरीत, धूम्रपान छोड़ना या रोगों के मामले में एहतियात बरतना संभव होता है। इसलिए वायु प्रदूषण इन अन्य स्थितियों की तुलना में बहुत अधिक लोगों को प्रभावित करता है। पूरी दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी अर्थात 5.5 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां पीएम2.5 विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन से अधिक होता है। इसलिए एचआइवी/ एड्स, टीबी, या युद्ध का प्रभावित लोगों पर कहीं अधिक प्रभाव होता है लेकिन उनसे बहुत कम लोग प्रभावित होते हैं। जैसे, ग्लोबल बर्डेन ऑफ डीजिज का अनुमान है कि 2016 में एचआइवी/ एड्स से मरने वाले लोग औसतन 51.8 वर्ष पहले मर गए। लेकिन इस रोग से प्रभावित 3.6 करोड़ लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने वाले 5.5 अरब लोगों की तुलना में बहुत कम हैं इसलिए वायु प्रदूषण का प्रभाव समग्र प्रभाव काफी अधिक है।


कणीय वायु प्रदूषण जीवन संभाव्यता को कहां सबसे अधिक घटा रहा है?

जैसा लोक स्वास्थ्य संबंधी अन्य जोखिमों के मामले में होता है, उसी तरह वायु प्रदूषण का बोझ पूरी दुनिया में हर किसी को सबको समान रूप से नहीं झेलना पड़ता है। कणीय प्रदूषण से विकासशील और एशिया के औद्योगीकृत हो रहे देश सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

अगर 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पीएम2.5 संबंधी गाइडलाइन का पालन नहीं करने वाले सारे क्षेत्र अपने कणीय प्रदूषण के स्तरों को घटाकर गाइडलाइन के अनुरूप ले लाते, तो दुनिया के स्तर पर :

28.8 करोड़ लोग, जो सब के सब उत्तरी भारत में रहने वाले हैं, औसत रूप में कम से कम 7 वर्ष अधिक जीते। इनलोगों का भारत की वर्तमान जनसंख्या में 23 प्रतिशत हिस्सा है।

    • एशिया में 34.7 करोड़ लोग औसतन 5 से 7 वर्ष अधिक जीते। इसमें नेपाल की 35 प्रतिशत, बंगलादेश की 16 प्रतिशत, चीन की 13 प्रतिशत, पाकिस्तान की 10 प्रतिशत, भारत की 9 प्रतिशत, और इंडोनेशिया की 1 प्रतिशत आबादी शामिल है।
    • एशिया और अफ्रीका के 93.7 करोड़ लोग औसतन 3 से 5 वर्ष अधिक जीते। इसमें 76 प्रतिशत बंगलादेशी, 46 प्रतिशत नेपाली, 29 प्रतिशत कांगो जनतंत्र-वासी, 29 प्रतिशत चीनी, 29 प्रतिशत पाकिस्तानी, 24 प्रतिशत भारतीय, और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अफ्रीका के अन्य देशों के निवासी शामिल हैं।
    • अतिरिक्त 4.1 अरब लोग 3 वर्ष तक अधिक जीते जिनकी उम्र में औसतन 1.1 वर्ष की वृद्धि होती।

तथ्य यह है कि दुनिया की आबादी में भारत और चीन का 36 प्रतिशत हिस्सा है लेकिन कणीय प्रदूषण के कारण दुनिया में जितने वर्षों के जीवन की कमी होती है उसमें उनका 73 प्रतिशत हिस्सा है। अगर भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन का पालन कर पाए तो वहां के लोग औसतन 4.3 वर्ष अधिक जिएंगे। अभी भारत में जीवन संभाव्यता 69 वर्ष है जिससे पूरे देश में कणीय प्रदूषण को घटाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन के स्तर पर ले लाने पर औसत जीवन संभाव्यता बढ़कर 73 वर्ष हो जाएगी। इसकी तुलना में भारत के कुख्यात मारक रोग टीबी का उन्मूलन करने पर जीवन संभाव्यता बढ़कर 70 वर्ष ही पहुंचेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन का पालन करने पर चीन के लोगों का औसत जीवनकाल 2.9 वर्ष बढ़ जाएगा। इस प्रकार इस मानक का पालन करने पर चीन की औसत जीवन संभाव्यता आज के 76 वर्ष से बढ़कर 79 वर्ष हो जाएगी। इस तरह धूम्रपान की उच्च दर वाले चीन में कणीय प्रदूषण सिगरेट पीने से भी अधिक मारक हो जाता है।

इसके विपरीत, उच्च आय वाले ओईसीडी देशों में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन कणीय प्रदूषण के कारण पड़ने वाला स्वास्थ्य संबधी बोझ वहां 3 प्रतिशत से भी कम है। वहीं, अमेरिका में लगभग एक-तिहाई आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन का पालन नहीं होता है। वहां देश के सर्वाधिक प्रदूषित राज्यों में रहने वाले लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन का पालन होने पर एक वर्ष तक अधिक जीने की आशा कर सकते हैं।

वायु प्रदूषण संबंधी नीतियों के प्रभाव के बारे में अधिक जानकारी यहां प्राप्त करें। यह जानने के लिए कि प्रदूषण के वर्तमान स्तरों पर दुनिया के किन देशों और क्षेत्रों में कितनी जीवन संभाव्यता कम हो जाती है, यह सूचकांक देखें।


कणीय वायु प्रदूषण कहां से आता है?

हालांकि कुछ कण धूल, समुद्री नमक, और जंगल की आग जैसे प्राकृतिक स्रोतों से भी आते हें, लेकिन अधिकांश पीएम2.5 प्रदूषण मनुष्यों द्वारा पैदा किया हुआ है।

तथ्य यह है कि हमें यह जानकारी काफी पहले से है कि कोयला को जलाने से हवा प्रदूषित होती है। 1300 ईस्वी के आसपास इंगलैंड के किंग एडवर्ड प्रथम ने तय किया था कि उनके राज्य में कोयला जलाने वाले को मौत की सजा दी जाएगी। आज मनुष्य द्वारा उत्पन्न पीएम2.5 का मुख्य वैश्विक स्रोत जीवाश्म इंधन जलाना है जो तीन अलग-अलग तरीकों से काम करता है [8] :

    • सर्वप्रथम, कोयला में गंधक होता है इसलिए कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों और औद्योगिक इकाइयों में सल्फर डायक्साइड गैस पैदा होती है। हवा में जाने के बाद यह गैस वायुमंडल के ऑक्सीजन और उसके बाद अमोनिया से प्रतिक्रिया करके सल्फेट कणों को पैदा कर सकती है।
    • दूसरे, वाहनों के इंधन और विद्युत संयंत्र जैसी चीजों में उच्च तापमान पर होने वाले दहन के दौरान नाइट्रोजन डायक्साइड गैस निकलती है जो हवा में वैसी प्रतिक्रिया करके नाइट्रेट कणों को पैदा करती है।
    • और तीसरे, डीजल इंजन, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र, और घरेलू इंधन के रूप में कोयला जलाना – सभी के दौरान अपूर्ण दहन होता है। इस प्रकार के दहन में इंधन की निश्चित मात्रा से अधिकतम संभव ऊर्जा पैदा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मौजूद नहीं होता है। इंधन का अधिशेष कार्बन पीएम5 का एक घटक – कजली – बन जाता है जिसका जलवायु परिवर्तन में कार्बन डायक्साइड और संभवतः मिथेन के बाद सबसे अधिक योगदान है।

जीवाश्म इंधन के दहन के अलावा, घर में खाना पकाने और घर गर्म करने के लिए लकड़ी और फसलों की ठूंठ जैसे जैव इंधनों के दहन के जरिए भी लोग पीएम2.5 पैदा करते हैं। जैव इंधन के जलने से ब्लैक कार्बन और कार्बनिक कण निकलते हैं। दुनिया के कई हिस्सों में कणीय प्रदूषण में जैव इंधनों के दहन का योगदान जीवाश्म इंधनों के तहत के साथ तुलनीय है। खेती के लिए जमीन साफ करने के लिहाज से बायोमास अर्थात जंगलों, घास के मैदानों (सवाना), और खेतों में फसलों की ठूंट को जलाना भी मानवजनित कणीय प्रदूषण का बड़ा स्रोत है।.[9]


इतना अधिक कणीय प्रदूषण क्यों होता है?

जीवाश्म इंधन आज ऊर्जा के सबसे सस्ते स्वरूप हैं और आर्थिक विकास के जरिए जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए ऊर्जा निहायत जरूरी है।

जैसा कि पहला चित्र दर्शाता है, ऐसे देशों का कोई उदाहरण नहीं है जहां ऊर्जा की ऊंचे स्तर पर खपत किए बिना ऊंचा जीवन स्तर हासिल किया गया है। इसलिए इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जैसे-जैसे आज के विकासशील (अर्थात गैर-ओईसीडी) देश विकसित होते जाएंगे, आशंका है कि वैसे-वैसे वे अधिक ऊर्जा की खपत करेंगे।

अनुमान है कि दुनिया में ऊर्जा की बढ़ती मांग के बड़े हिस्से की पूर्ति जीवाश्म इंधनों से होना जारी रहेगा। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार,  2016 के अंत तक लागू नीतियों और किए गए वादों के आधार पर 2040 में दुनिया भर में ऊर्जा की आपूर्ति में जीवाश्म इंधनों से होने वाली आपूर्ति का 74 प्रतिशत हिस्सा होगा जो 2014 में 81 प्रतिशत था।

जब हम जानते हैं कि जीवाश्म इंधनों के कारण वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन होता है, तो फिर दुनिया में जीवाश्म इंधनों पर इतना अधिक भरोसा जारी रहने के अनुमान का क्या कारण है? इस कारण कि वे कम खर्चीले हैं और उनकी कीमतों में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन – अर्थात अर्थशास्त्रियों की भाषा में ‘‘एक्सटर्नलिटीज’’ की कीमत जुड़ी हुई नहीं है।

उदाहरणस्वरूप, अमेरिका में पर्यावरण संबंधी सारे जरूरी नियंत्रणों वाले किसी नए कोयला आधारित विद्युत संयंत्र द्वारा पैदा एक किलोवाट-आवर ऊर्जा की लागत सिर्फ 8 सेंट के आसपास होगी। और पर्यावरण संबंधी उन नियंत्रणों के बिना तो लागत लगभग 3 सेंट प्रति किलोवाट-आवर ही होगी। हाइड्रॉलिक फ्रैक्चरिंग क्रांति के कारण अमेरिका में प्राकृतिक गैस आधारित कंबाइन्ड साइकल संयंत्र द्वारा उत्पादित बिजली की लागत लगभग 5.5 सेंट प्रति किलोवाट-आवर है। इसके विपरीत, आणविक या नवीकरणीय स्रोतों जैसे कम कार्बन वाले स्रोतों से उत्पादित बिजली की लागत दूनी-तिगुनी होती है।

जीवाश्म इंधन सस्ते ही नहीं हैं, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भी हैं। दुनिया में ये निकट भविष्य में खत्म नहीं होने जा रहे हैं। अकेले तेल 55 वर्षों के लिए, प्राकृतिक गैस एक सदी के लिए, और कोयला तो बहुत लंबे समय के लिए उपलब्ध हैं जबकि तेल और गैस कम्पनियों द्वारा इनके नए-नए स्रोतों की खोज जारी रहेगी।


कणीय प्रदूषण के प्रभाव में समय के साथ कैसा बदलाव आया है?

वर्ष 1998 से 2016 के बीच दुनिया भर में कणीय प्रदूषण बढ़ा है जिससे औसत व्यक्ति की उम्र औसत 9 महीने के आसपास घटी है। अगर हवा की गुणवत्ता के मामले में 1998 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के गाइडलाइन का दुनिया भर में पालन किया जाता, तो औसत जीवन संभाव्यता 1.0 वर्ष अधिक हो गई होती। चूंकि 2016 में कणीय प्रदूषण का औसत संकेंद्रण 7.8 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर बढ़ गया है इसलिए वैसी स्थिति रहने पर जीवन संभाव्यता अभी से 1.8 वर्ष बढ़ गई होती।

विकासशील देशों में, जो अधिकांशतः एशिया और अफ्रीका में हैं, 1998 से 2016 के बीच कणीय प्रदूषण में सबसे अधिक वृद्धि दिखी। इसका अर्थ हुआ कि विश्व स्वास्थ्य संघ के गाइडलाइन का पालन करने पर कुछ देशों में जीवन संभाव्यता एक वर्ष से भी अधिक बढ़ जाती। भारत में तो यह 2.2 वर्ष और बंगलादेश में 1.7 वर्ष बढ़ जाती। पिछले 20 वर्षों में औद्योगीकरण, आर्थिक विकास, और जनसंख्या वृद्धि के कारण इन देशों में ऊर्जा की मांग काफी बढ़ी है। जैसे, जबर्दस्त आर्थिक विकास वाले चीन में 1995 से 2015 के बीच कोयला आधारित बिजली का उत्पादन पांचगुना बढ़ गया जबकि भारत में भी यह तिगुना से अधिक बढ़ गया। [10] ऊर्जा के इतने अधिक उपयोग से आर्थिक उत्पादन और सामग्रियों का उपभोग बढ़ा है और निस्संदेह लोगों की खुशहाली भी बढ़ी है, लेकिन उसके कारण हवा में कणीय पदार्थ भी बढ़े हैं। साथ ही, गैर-ओईसीडी क्षेत्रों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ते रहने का ही अनुमान है। [11] इसलिए समवेत नीतिगत कार्रवाइयों के अभाव में कणीय प्रदूषण की गंभीरता बढ़ने का रुझान जारी रहने का ही अनुमान है।

इसके विपरीत, पिछले कुछ दशकों में उत्तरी अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों में कणीय प्रदूषण में कमी आती दिखी है। हालांकि एक समय उन्हें भी गंभीर कणीय प्रदूषण की समस्या झेलनी पड़ी थी जो संभवतः आज के सर्वाधिक प्रदूषित देशों जैसी ही थी, लेकिन प्रदूषक उद्योगों को देश से हटाने और अच्छी तरह क्रियान्वयन वाली प्रदूषण संबंधी नीतियों के गंभीरता से पालन ने इनमें से अनेक देशों में हवा को स्वच्छ करने में बड़ी भूमिका निभाई है। आज औसत अमेरिकी या ब्रितानी की जीवन संभाव्यता कणीय प्रदूषण के कारण एक महीने से भी कम घटती है।


क्या देशों ने कणीय प्रदूषण की समस्या पर काबू पा लिया है?

आज बीजिंग और दिल्ली जैसी जगहों पर जिस तरह से आर्थिक विकास और पर्यावरण की गुणवत्ता की दुहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वे उससे भिन्न नहीं हैं जिनका सामना औद्योगीकरण के दौर में एक समय इंगलैंड के लंदन, लॉस एंजेल्स, कैलिफोर्निया, या जापान के ओसाका को करना पड़ा था जिन्हें एक समय क्रमशः ‘‘विशाल धुआं’’, ‘‘विश्व के स्मॉग की राजधानी’’ और ‘‘धुआं की राजधानी’’ के नाम से जाना जाता था।

पूर्व में प्रदूषण की राजधानी की विरासत वाले ये शहर आज संपन्न, ओजपूर्ण, और काफी साफ-सुथरे शहर हैं। इससे स्पष्ट है कि आज के प्रदूषण को कल की नियति बन जाने देने की जरूरत नहीं है। हालांकि इन देशों में हवा अचानक साफ नहीं हो गई थी। ऐसा सशक्त नीतियों के चलते हुआ। जैसे, अमेरिका में 1970 में स्वच्छ वायु अधिनियम पारित होने के बाद से वायु प्रदूषण लगभग 62 प्रतिशत घटा और उसके कारण अमेरिकी लोग आज औसतन 1.5 वर्ष अधिक जी रहे हैं। इसी तरह, इंगलैंड में प्रदूषण 1956 में स्वच्छ वायु अधिनियम पारित होने के बाद से घटा है। जापान में 1960 के दशक में अनेक मुकदमों और पर्यावरण संरक्षण कानूनों की शुरुआत हुई जिन्होंने वायु प्रदूषण के स्तर को घटाकर अमेरिका के समकक्ष लाने में मदद की है।

हालांकि ये परिवर्तन रातोंरात नहीं हो सकते थे। पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण घटाने में नीतियों की भूमिका के बारे में अधिक जानकारी यहां प्राप्त करें।


क्या कणीय प्रदूषण का जलवायु परिवर्तन से कुछ लेना-देना है?

अभी वायु प्रदूषण की चुनौती मुख्यतः विकासशील देशों में संकेंद्रित है इसलिए कणीय वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत रहे जीवाश्म इंधनों के उपयोग के बारे में इन देशों में लिए गए फैसलों का पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए कि खतरनाक वायु प्रदूषण पैदा करने वाले जीवाश्म इंधनों के दहन से ग्रीनहाउस गैसें भी निकती हैं जो विध्वंसक जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को बढ़ाती हैं। और वायु प्रदूषण तो काफी स्थानीय चरित्र वाला होता है लेकिन जलवायु परिवर्तन इसकी फिक्र नहीं करता है कि आप कहां रहते हैं। इसका असर सारे देशों पर होगा। जैसे अबाध जलवायु परिवर्तन अमेरिका को अपेक्षाकृत गरीब और अधिक असमान बना देगा। जलवायु परिवर्तन के सामाजिक और आर्थिक व्यय की समझ बढ़ाने के लिए किए जा रहे अपने किस्म के पहले बहुविषयी प्रयास क्लाइमेट इंपैक्ट लैब के एक शोध के अनुसार, अगर दुनिया का गर्म होना अबाध रूप से जारी रहा, तो अमेरिका के एक-तिहाई सबसे गरीब राज्यों को अपनी आय का 20 प्रतिशत तक आर्थिक नुकसान होते रहने की आशंका है।

 

[1] ज़िंग एवं अन्य, 2016

[2] जैसे लिंग एवं वान ईडन, 2009

[3] गिब्बेंस, 2018

[4] इयादेकोला, 2013

[5] विल्सन एवं सुह, 1997

[6] गणना जीबीडी 20016 पर आधारित

[7] फिलिप एवं अन्य, 2014

[8] एनआरसी, 2010

[9] फिलिप एवं अन्य, 2014

[10] आइईए, 2018

[11] बीपी एनर्जी आउटलुक 2018 डेटा पैक

 

टिप्पणियां और स्रोत

बीपी एनर्जी आउटलुक (2018). डेटा पैक [डेटा फाइल]. https://www.bp.com/en/global/corporate/energy-economics/energy-outlook.html से प्राप्त.

गिब्बेंस एस. (2018). एयर पॉल्यूशन रॉब्स अस ऑफ आवर स्मार्ट्स एंड आवर लंग्स. नेशनल ज्योग्राफिक. https://www.nationalgeographic.com/environment/2018/09/news-air-quality-brain-cognitive-function/?user.testname=none से प्राप्त.

ग्लोबल बर्डेन ऑफ डीजिज. (2016). http://ghdx.healthdata.org/gbd-2016 से प्राप्त.

इयादेकोला, सी. (2013). द पैथोलॉजी ऑफ वस्कुलर डिमेंशिया. न्यूरॉन80(4), 844-66.

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लिंग, एस. एच., एवं वान ईडन. (2009). पार्टिकुलेट मैटर एयर पॉल्यूशन एक्सपोजर : रोल इन द डेवलपमेंट एंड एक्जैसर्बेशन ऑफ क्रॉनिक पल्मोनरी डिजिज. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजिज, 4, 233-43.

नेशनल रिसर्च काउंसिल. (2010). ग्लोबल सोर्सेज ऑफ लोकल पॉल्यूशन : ऍन असेसमेंट ऑफ लौंग-रेंज ट्रांसपोर्ट ऑफ की एयर पॉल्यूटेंट्स टू एंड फ्रॉम द यूनाइटेड स्टेट्स. वाशिंगटन, डीसी: द नेशनल एकेडमीज प्रेस.

फिलिप, एस., मार्टिन, आर.वी., वान डोंकेलार, ए., लो, जे.डब्ल्यू., वांग, वाइ., चेन, डी., …, मैक्डोनाल्ड, डी.जे. (2014). ग्लोबल केमिकल कंपोजीशन ऑफ ऍबिएंट फाइन पार्टिकुलेट मैटर फॉर एक्सपोजर असेसमेंट. एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नौलॉजी, 48(22), 13060-13068.

विल्सन, डब्ल्यू.ई. एवं सुह, एच.एच. (1997). फाइन पार्टिकल्स एंड कोर्स पार्टिकल्स : कन्संट्रेशन रिलेशनशिप्स रिलिवेंट टू एपिडेमियोलॉजिकल स्टडीज. जर्नल ऑफ द एयर एंड वेस्ट मैनेजमेंट एसोसिएशन47(12), 1238-1249.

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